भोपाल (स्टेट ब्यूरो) - इस चुनावी साल में मध्यप्रदेश में रैली-धरना-प्रदर्शनों-हड़तालों की जैसे बाढ़ सी आ गई है. गुजरे एक साल में सूबे की जनता को जितनी बड़ी तादाद में सरकार के खिलाफ कर्मचारियों की मैदानी जंग देखने को मिली, उतनी 5 साल में नहीं नजर आईं. कर्मचारियों की शक्ल में हड़ताल करने वाली भी जनता ही थी और हड़तालों का खामियाजा भुगतने और अपने काम न होने से परेशान होने वाली भी जनता ही थी. इस साल के अंत में चुनाव होने हैं, लिहाजा हर कर्मचारी सरकार को अपनी नाराजगी और वोट की ताकत का अहसास कराकर अपनी मांगें पूरी कराना चाहता है. गुजरे एक साल में शायद ही कोई सरकारी महकमा हो, जिसने आंदोलन की हुंकार न भरी हो. कर्मचारी संगठन सरकार का ध्यान खींचने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते हैं. सरकार को भी इस परिस्थिति का अहसास है, इसलिए मांगें मानकर, घोषणाएं कर मान-मनौव्वल, पुचकार, दुलार में जुटी है. दूसरी तरफ विपक्ष इस असंतोष को अपने पक्ष में भुनाने की कोशिशों में जुटा है. कर्मचारी संगठनों का मत है कि सरकार के कर्मचारी विरोधी रवैये से प्रदेश के कर्मचारी नाराज हैं, सरकारी महकमों में ही दो लाख से ज्यादा ...