जनसंख्या नियंत्रण के उद्देश्य से भारत में वर्ष 1951 से ही परिवार नियोजन कार्यक्रम चलाया जा रहा है किन्तु जोर-शोर से यह कार्यक्रम चलाए जाने के बावजूद देश में जनसंख्या सुरसा की भांति बढ़ती गई और जनसंख्या पर नियंत्रण पाने के मामले में भारत अन्य देशों के मुकाबले फिसड्डी साबित हुआ है। हर साल विश्व जनसंख्या दिवस के अवसर पर भारत में भी लंबे-चौड़े आश्वासनों का पिटारा खोला जाता है लेकिन उस पर अमल के प्रति कोई गंभीर नहीं रहता, नतीजा वही ढाक के तीन पात। हालांकि यह बात सही है कि जनता की सहभागिता के अभाव में सरकार द्वारा जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण पाने के लिए किया जाने वाला प्रचार-प्रसार उतना उपयोगी साबित नहीं हो पाता। यह भी हककीत है कि विगत दशकों में देश की जनसंख्या जिस गति से बढ़ी, उस गति से कोई भी सरकार जनता के लिए आवश्यक संसाधन जुटाने की व्यवस्था करने में सफल नहीं हो सकती थी। बढ़ती आबादी की विस्फोटक परिस्थितियों के कारण ही संविधान में जिस उद्देश्य से प्राथमिक शिक्षा का लक्ष्य निर्धारित किया गया था, वह भी गौण होकर रह गया है।बढ़ती आबादी की वजह से बेरोजगारी की समस्या विकराल हो चुकी है। 1951 में देश में करीब 33 लाख व्यक्ति बेरोजगार थे लेकिन यह संख्या अब बीस करोड़ से ज्यादा हो चुकी है। हालांकि विगत दशकों में विभिन्न योजनाओं के माध्यम से नए रोजगार जुटाने के कार्यक्रम चलाए गए लेकिन बढ़ती आबादी के कारण ये सभी कार्यक्रम ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ ही साबित हुए। दरअसल बेरोजगारी और गरीबी वे समस्याएं हैं, जिनके कारण भ्रष्टाचार, चोरी, अराजकता व आतंकवाद जैसे अपराध पनपते हैं और जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण किए बिना इन समस्याओं का समाधान संभव नहीं। विगत दशकों में यातायात, चिकित्सा, आवास इत्यादि सुविधाओं में व्यापक सुधार हुए हैं लेकिन तेजी से बढ़ती आबादी के कारण ये सभी सुविधाएं भी बहुत कम पड़ रही हैं।
देश में 40 फीसदी आबादी आजादी के बाद से ही गरीबी के आलम में जी रही है। गरीबी में जीवन गुजार रहे ऐसे बहुत से लोगों की यही सोच रही है कि इनके यहां जितने ज्यादा बच्चे होंगे, उतने ही ज्यादा कमाने वाले हाथ होंगे किन्तु यह सोच वास्तविकता के धरातल से बिल्कुल परे है। तेजी से बढ़ती महंगाई के जमाने में परिवार बड़ा होने से कमाने वाले हाथ ज्यादा होने पर जितनी आय बढ़ती है, उससे कहीं ज्यादा जरूरतें और विभिन्न उत्पादों की कीमतें बढ़ जाती हैं, जिनकी पूर्ति कर पाना सामर्थ्य से परे हो जाता है। इसलिए जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रमों की सफलता के लिए सर्वाधिक जरूरी यही है कि घोर निर्धनता में जी रहे ऐसे लोगों को परिवार नियोजन कार्यक्रमों के महत्व के बारे में जागरूक बनाने की ओर खास ध्यान दिया जाए क्योंकि जबतक इस कार्यक्रम में इनकी भागीदारी नहीं होगी, तबतक लक्ष्य की प्राप्ति संभव नहीं है।जनसंख्या पर प्रभावी रोक लगाने के मामले में चीन का उदाहरण सामने रखकर ही हमें आगे के लक्ष्य तय करने होंगे। एक दशक से भी अधिक समय से चीन की जनसंख्या स्थिर बनी हुई है, जिसका प्रमुख कारण यही है कि चीन सरकार ने औसत मृत्यु दर के आधार पर ही जन्मदर को भी नियंत्रित करने की व्यवस्था बनाते हुए छोटा परिवार रखने वाले लोगों के लिए विशेष सरकारी लाभों का प्रावधान किया, जिसके सार्थक परिणाम सामने आए हैं। हालांकि हमारे लिए कुछ हद तक यह संतोष का विषय हो सकता है कि जनसंख्या वृद्धि दर के वर्तमान आंकड़ों की देश की आजादी के बाद के शुरूआती दो दशकों से तुलना करें तो 1970 के दशक से जनसंख्या वृद्धि दर में निरन्तर गिरावट दर्ज की गई है लेकिन यह गिरावट दर काफी धीमी है।
1960 के दशक में जनसंख्या वृद्धि की दर 1950 के दशक का भी आंकड़ा पार कर 24.8 प्रतिशत तक पहुंच गई थी लेकिन उसके बाद के दशकों में जनसंख्या वृद्धि में गिरावट दर्ज की गई। 1971-81 के दौरान यह वृद्धि दर 24.66 प्रतिशत, 1981-91 के दौरान 23.86 प्रतिशत तथा 1991-2001 में 21.34 प्रतिशत रिकॉर्ड की गई। पिछले कुछ दशकों में शिक्षा और स्वास्थ्य के स्तर में भी निरन्तर सुधार हुआ है किन्तु यदि हम चीन का उदाहरण सामने रखकर भारत में जनसंख्या वृद्धि में हो रही कमी को देखें तो हम जनसंख्या नियंत्रण के मामले में लाख कोशिशों के बाद भी चीन जैसी उपलब्धियां हासिल करने में सफल नहीं हो पाए हैं। दरअसल हमारे यहां प्रायः ऐसे मामलों में राजनीतिक स्तर पर दृढ़ इच्छाशक्ति का अभाव रहा है।जहां तक प्रति हजार पुरुषों पर महिलाओं की संख्या का सवाल है तो भले ही जनसंख्या वृद्धि दर धीमी गति से घट रही है किन्तु यह भी कम चिन्ता का विषय नहीं है कि जनसंख्या वृद्धि दर घटते जाने के साथ-साथ प्रति हजार पुरुषों पर महिलाओं की संख्या भी घट रही है। निःसंदेह यह सब पुत्र की चाहत में कन्या भ्रूणों को आधुनिक मशीनों के जरिये गर्भ में ही नष्ट किए जाने का ही दुष्परिणाम है। जनसंख्या वृद्धि में अपेक्षित कमी लाने के साथ-साथ जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रमों में इस बात का ध्यान रखे जाने की भी नितांत आवश्यकता है कि पुरुष व महिलाओं की संख्या का अनुपात किसी भी सूरत में न बिगड़ने पाए क्योंकि यदि यह अनुपात इसी कदर गड़बड़ाता रहा तो आने वाले समय में इसके कितने घातक नतीजे सामने आएंगे, इसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते।
जनसंख्या वृद्धि की वर्तमान स्थिति की भयावहता को मद्देनजर रखते हुए पर्यावरण विशेषज्ञों की इस चेतावनी को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि यदि जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार में अपेक्षित कमी लाने में सफलता नहीं मिली तो निकट भविष्य में एक दिन ऐसा आएगा, जब रहने के लिए धरती कम पड़ जाएगी। विश्व भर में अभी भी करीब डेढ़ अरब लोग ढलानों पर, दलदल के करीब, जंगलों तथा ज्वालामुखी के क्षेत्रों जैसी खतरनाक जगहों पर रह रहे हैं। बढ़ती जनसंख्या जहां समूचे विश्व के लिए गहन चिन्ता का विषय बनी है, वहीं बढ़ती आबादी का सर्वाधिक चिन्तनीय पहलू यह है कि बढ़ती जनसंख्या का सीधा प्रभाव पर्यावरण पर पड़ रहा है। विश्व विकास रिपोर्ट के अनुसार प्राकृतिक संसाधनों से जितनी भी आमदनी हो रही है, वह किसी भी तरह पूरी नहीं पड़ रही, दशकों से यही स्थिति बनी है और इसे लाख प्रयासों के बावजूद सुधारा नहीं जा पा रहा। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक सन् 2050 तक विश्व की दो तिहाई आबादी नगरों में रहने लगेगी और तब ऊर्जा, पानी तथा आवास की मांग और बढ़ेगी जबकि बहुत से पर्यावरणविदों का मानना है कि सन् 2025 तक ही विश्व की एक तिहाई आबादी समुद्रों के तटीय इलाकों में रहने को विवश हो जाएगी और इतनी जगह भी नहीं बचेगी कि लोग सुरक्षित भूमि पर घर बना सकें। इससे तटीय वातावरण तो प्रदूषित होगा ही, पर्यावरण का संतुलन भी बिगड़ जाएगा।
इन सब बातों पर विमर्श करते हुए आज इस बात की नितांत आवश्यकता महसूस होने लगी है कि दुनिया के ऐसे प्रत्येक देश में, जो जनसंख्या विस्फोट की समस्या से जूझ रहा है, जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम युद्धस्तर पर चलाए जाएं और जनता को जागरूक करने के लिए विशेष अभियान चलाए जाएं। भारत जैसे विकासशील देश में तो इसकी और भी ज्यादा जरूरत है क्योंकि हमारे यहां ऐसे कार्यक्रम प्रायः बड़े जोश के साथ शुरू तो होते हैं किन्तु अक्सर ऐसी योजनाएं शुरू होने के कुछ ही समय बाद टांय-टांय फिस्स होने लगती हैं। अतः जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण पाने के लिए चीन की भांति हमें कठोर और कारगर कदम उठाते हुए ठोस जनसंख्या नियंत्रण नीति पर अमल करने हेतु दृढ़ होना होगा ताकि कम से कम हमारी भावी पीढि़यां तो जनसंख्या विस्फोट के विनाशकारी दुष्परिणाम भुगतने से बच सकें।
Comments
Post a Comment