भोपाल (स्टेट ब्यूरो) - जिसके कदमों की रफ्तार ने मध्य प्रदेश वन विभाग की झोली में एक के बाद एक दर्जनों गोल्ड मेडल डाल दिये हों उसी वन विभाग का ‘मिल्खा’ आज दर-दर भटकने पर मजबूर है. कहने को तो वो वन विभाग में चौकीदार है लेकिन उनकी पहचान बेमिसाल धावक के तौर पर है. इसी टेलेंट ने उन्हें मिल्खा का नाम दिया. लेकिन इस धावक के प्रमोशन की रफ्तार पर ब्रेक लगा हुआ है. शहडोल के उत्तर वन मंडल में चौकीदार की नौकरी कर रहे यज्ञ नारायण सेन शहडोल से लेकर भोपाल तक कई बार आला अधिकारियों से लेकर विभागीय दफ्तर तक चक्कर काट कर थक चुके हैं. अब तक कोई सुनवाई नहीं हुई. उम्मीद की एक और किरण लिए इस बार वो भोपाल में बीजेपी प्रदेश मुख्यालय पहुंचे ताकि कहीं कोई सुनवाई हो जाए. लेकिन यहां भी यज्ञ नारायण सेन को निराशा ही हाथ लगी. उनकी यहां किसी जिम्मेदार व्यक्ति से मुलाकात नहीं हो सकी.
क्या है मांग ?
यज्ञ नारायण की नियुक्त 1988 में शहडोल के उत्तर वन मण्डल में हुई थी. तब से वो वहां चौकीदार के पद पर काम कर रहे हैं. ये तो उनकी सरकारी पहचान है. लेकिन दफ्तर के बाहर ये बेमिसाल धावक हैं. वो करीब एक सैकड़ा मैडल वन विभाग की झोली में डाल चुके हैं. यज्ञ नारायण का कहना है कि उन्हें अब तक न तो कोई प्रमोशन दिया गया और उल्टा उन्हें कार्यभारित बताकर उनका वेतन भी आधा कर दिया गया. यज्ञ नारायण का कहना है उन्होंने विभाग के लिए इतने मैडल जीते हैं आखिर विभाग को उनके बारे में कुछ तो सोचना चाहिए.
वन विभाग के ‘मिल्खा’
यज्ञ नारायण सेन शुरू से ही धावक बनने का सपना पाले हुए थे. इस दिशा में उन्होंने अपने हुनर को तराशना भी शुरू किया. इस बीच उन्हें वन विभाग में चौकीदार की नौकरी मिल गयी. लेकिन उन्होंने दौड़ने का सिलसिला जारी रखा. विभाग की तरफ से कई बार प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर खेलने का मौका मिला और यज्ञ नारायण ने कभी निराश भी नहीं किया. उनके पास एक झोला भरके मेडल हैं जिनकी संख्या 100 से भी ज्यादा है.
क्यों ध्यान नहीं दे रही सरकार
सरकारी नौकरियों में खिलाड़ियों के लिए अलग से कोटा है. ओलंपिक में पदक जीतने पर खिलाड़ियों पर इनाम और नौकरियों की बारिश हो जाती है. लेकिन सरकारी विभाग में जो शख्स पहले से ही खिलाड़ी है उसकी कोई पूछ परख नहीं हो रही है. खिलाड़ियों के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रही सरकार अपने एक धावक के लिए कुछ तो मदद कर ही सकती है.
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