लोकसभा के उपचुनाव, भारतीय जनता पार्टी के सांसद के लंबे प्रवास के लिए निकलने से रिक्त इस सीट पर आगामी तीस तारीख को मतदान होना है। ओर साल के अंतिम माह से पूर्व 2 नवंबर को नया मुखिया मिलना है। लोकतंत्र के हवन कुंड में कितनी आहुतियां डलती है, अभी कह पाना मुश्किल है पर चुनाव आयोग पूरी संजीदगी से चुनाव करवाने और मतदान करवाने के लिए मेहनत कर रहा है इस बात से भी इंकार नही किया जा सकता।
चक्र डेस्क (राकेश चौकसे की कलम से) - राजनेतिक हल्को में चल रही चर्चा के अनुसार इस उप चुनाव में किसकी चली कह पाना और लिख पाना मुश्किल है। क्योंकि शिवराज सिंह चौहान मुखिया मध्यप्रदेश की अपनी पसंद थी, खंडवा ! वाले का का अपना खुद का केडर और हिंदूवादी छबि समीकरण कुछ अलग बता रही थीं। माननीया जी को हाई कमान का आशीर्वाद मिला हुआ था तो पश्चिम निमाड़ के अपने इरादे कुछ और ही थे। यह सभी ओर इनके समर्थक प्रतिदिन मंगल गीत गा रहे थे, पर ऐन वक्त पर जो नाम सामने आया उससे कयास लगाने वाले दबी जुबान काना फूसी कर रहे थे आखिर इस उपचुनाव में चली किसकी! आकलन वाले सभी उम्मीदवार हाशिए पर नजर आ रहे थे। भारतीय जनता पार्टी ने जिस उम्मीदवार को मैदान सम्हालने का अवसर दिया वह यह लिखने के लिए बाध्य करता है, प्रत्याशी के अलावा किसी की नही चली। कांग्रेस ने कमलनाथ को तवज्जो दे मंगल गीत गवाने का मौका दिया है। देखना यह है निमाड़ में पंजे वाले तिरंगे की चाल पटरी से उतर रही थीं, क्या पुनः पटरी पर आ जायेगी। गौरतलब हो की कुछ 14-15 माह पूर्व ही नेपानगर विधायक ने कांग्रेस से त्याग पत्र देकर भाजपा का दामन थाम कर अपनी सीट अजेय रखी थीं। कमलनाथ के हाथ संभवत इसी लिए मजबूत किए हो विधानसभा का हिसाब लोक सभा में लिया जा सके निर्णायक भूमिका सौंपी हो। निमाड़ की राजनीति में दिलचस्प बात यह है। दोनो ही पार्टियां एकता के नारे को बुलंद कर रहे है किंतु सतही तौर पर सरसरी नजर दौड़ाएं तो गुटबाजी से ग्रस्त नजर आती दिखाई दे रही है, और असंतोष उफान मार रहा है। गौरतलब है की बीजेपी से स्वर्गीय नंदकुमार सिंह चौहान साहब के स्वर्गगामी होने से रिक्त सीट पर इनके पुत्र हर्षवर्धन सिंह चौहान का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा था तो शिक्षित और राजनीतिका लंबा अनुभव रखने वाली आदरणीय अर्चना दीदी का नाम भी दावेदारों की गिनती में शुमार था। वर्तमान परिदृश्य हल्का हल्का साफ दिखाई दे रहा है, दोनो प्रमुख दलों के थोपे निर्णय को स्वीकार नही किया जा रहा किंतु दलों के अपने संविधान, अनुशासन से बंधे छोटे कार्यकर्ता शिरोधार्य कर, कुछ गली, मोहल्ला सड़को पर नजर आ रहे तो कुछ अज्ञातवास पर हो लिए है।
निमाड़ के राजनिति की राह आसान तो नजर नही आ रही, मुख्य मुकाबला कांग्रेस से कमलनाथ और बीजेपी से शिवराज सिंह चौहान साहब के बिच नजर आने लगा है। यहां कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव जी बड़ी सफगोई से उप चुनाव की गेंद कमलनाथ जी के पाले में खिसका दी है। क्योंकि उम्मीदवार चयन में पूरा दारोमदार कमलनाथ जी कंधे पर नज़र आ रहा था। अगर कांग्रेस चुनाव जीतती है तो प्रदेश के सूबे में कमलनाथ जी का कद ऊपर चले जाएगा। अगर उप चुनाव भाजपा जीतती है तो इसका श्रेय शिवराज जी को न जाकर निमाड़ के नेताओं के साथ, अर्चना दीदी, रामदास शिवहरे, राजू शिवहरे, रमेश पाटीदार, मनोज लाधवे को जाएगा। और अगर भाजपा चुनाव नही जीत पाती तो, संदेश जाएगा की संगठन की पकड़ विधान सभा चुनाव से ज्यादा ढीली पड़ गईं है। टैक्टर की छोड़ी धूल अब भी संक्रमण को फैला कर छोटे छोटे नेताओ, कार्यकर्ताओं, आम मतदाताओं को अब भी संक्रमित कर रही है। पूर्व निमाड़ संसदीय क्षैत्र का रूझान देखा जाए तो छः चुनाव में मात्र एक बार भाजपा की झोली से निकलकर यह सीट कांग्रेस के पास गई थीं। इस समय केंद्र और राज्य में भाजपा की सरकार है। और लहर भी इसी पार्टी की चल रही हे। ऐसे में पुरानी तासीर को देखा जाए तो इस सीट पर भाजपा का पलड़ा भारी लगता है, लेकिन यदि कांग्रेस यह उप चुनाव जीत लेती है तो फिर मतदाताओं के मानस पर होने वाले परिवर्तन का सूचक माना जाएगा। चुनाव की राजनिति में कई मर्तबा वैसा नही होता जैसा होता दिखाई देता है। चुनावो में हमेशा चमत्कार की गुंजाइश बनी रहती है। कांग्रेस भी दमखम के साथ चुनाव लडने की तैयारी कर रही हे उसे किसी चमत्कारी नतीजे की उम्मीद है। आस पर ही आसमान टीका हुआ है। नतीजे चाहे जो हो मतदाता कोई न कोई संकेत अवश्य देंगे। जिसके सहारे भाजपा और कांग्रेस को अपनी भविष्य की रणनीति बनाने में मदद मिलेगी।
चुनावी समर का हर अध्याय आपके समक्ष रखेगे देखते, पढ़ते रहे चलता चक्र साप्ताहिक...
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