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2018 में भाजपा प्रत्याशी का विरोध कर आंतरिक अंतर्कलह फैलाने वाले नेता 2023 के लिए दावेदारी ठोक रहे है !

 

बुरहानपुर (जिला ब्यूरो -करण चौकसे ) - क्या भारतीय जनता पार्टी का एक घड़ा जो 2018 से ही पार्टी प्रत्याशी के साथ पार्टी के खिलाफ खडे थे. उनकी समग्र राजनीति टकराव पर ही आधारित रहती ? उनकी टकराव की आदत राजनैतिक विरोधियों के साथ सत्ताधारी दल के नेताओ के साथ हमेशा बनी रहती है ! इस लिखावट के मूल में जानें से पहले हमने शब्दों की गरिमा के साथ राजनीतिक वातावरण और राजनीती में पनपने वाली दुषितता को देखने का प्रयास किया है। 2018 के राजनीतिक परिदृश्य और चुनाव की गरीमा को सभी राजनीतिक पार्टी के कार्यकर्ताओं ने नजदीक से देखा और भोगा है। लोकतंत्र के संविधानिक इतिहास में प्रथम अवसर होंगा जब दो बड़े राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता अपने दल के प्रत्याशी का साथ छोड़कर किसी दुसरे प्रत्याशी पर जीत का दावा ठोक रहे थे। इस चुनाव की विडंबना कहे या दलों का दुर्भाग्य न भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और भारतीय जानता पार्टी की नैसर्गिक मां आरएसएस ने इस विषय पर अपनी चुप्पी तोडी थी और नाही सख्त लहजे में विरोधियों को आगाह किया था परिणाम सामने था क्षेत्र के साथ साथ राज्य से सत्ता चली गई थीं। उसी प्रकार कांग्रेस का अपना अलग वोट बैंक होने के वावजूद अपने वोटो के सहजने में नाकामयाब रहा परिणाम 15से17 हजार वोटो पर संतोष कर किसी तीसरे की जीत के जश्न में सरोबार होना पड़ा था। आख़िर राजनीतिक दलों में कौनसी संस्कृति पनप रही है ? 2018 सबक होना था पर 2018 से सबक लेगा कौन ? 2018के बाद लोक सभा का उप चुनाव भी प्रत्यक्ष उदाहरण है, इस चुनाव और चुनाव की प्रतिष्ठा को दाव पर लगाया किसने था ? कौन नाराजगी के बहाने दूरी बना भाजपा की रीड को तोड़ना चाहता था ? अगर विधान सभा के बाद उप चुनाव में भाजपा की हार मतलब अमर बेल का सुखना नही था! कितनी विडंबना है विधान सभा, लोक सभा उप चुनाव, नगरीय निकाय, नगर परिषद के चुनाव में गुटबाजी और घड़े बाजी करने वाले नेता और इनके पोषक कार्यकर्ता बड़ी बेशर्मी से प्रत्याशीयो के विरोध में काम करते रहे और वही 2023 में दावेदारी ठोकने के लिय मजबूती से अपना पक्ष रख रहे है। देखना है आने वाले समय में सत्ता के गलियारे से कौन बाहर निकलता है।

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