प्रदेश के आदिवासी अंचल में मचेगी भगोरिया की धूम, दिखेगी प्राचीन परंपरा की झलक, इस बार लोकसभा चुनावों के बीच भगोरिया हाट
भागोरिया एक ऐसा उत्सव है जो उमंगों के रंग और गुलाल को खुद में समेटे हुए है। ये एक ऐसा उत्सव है जो आदिवासियों के जीवन में उत्साह ले कर आता है, प्रदेश के आदिवासी बाहुल्य इलाकों में भगोरिया की धूम तो है। जगह-जगह पर भगोरिया मेला भी लगता है लेकिन, इस उत्सव का कनेक्शन सिर्फ मध्यप्रदेश से ही नहीं देश के कई इलाकों से भी है।
कैसे हुई शुरुआत
भगोरिया को लेकर दो अवधारणाएं हैं जब आप झाबुआ जिले में आते हैं तो झाबुआ जिले में लोग कहते हैं कि भगोरिया की शुरुआत भगोर गांव से हुई थी। जो कि जिला मुख्यालय झाबुआ से 121 किलोमीटर की दूरी पर है। लेकिन, भगोरिया पर लिखी कुछ किताबों के अनुसार भगोरिया राजा भोज के समय लगने वाले हाटों को कहा जाता था। इस समय दो भील राजाओं कासूमार और बालून ने अपनी राजधानी भागोर में विशाल हाट का आयोजन करना शुरू किया। धीरे-धीरे आस-पास के भील राजाओं ने भी इन्हीं का अनुसरण करना शुरू किया जिससे हाट और मेलों को भगोरिया कहना शुरू हुआ। एक दंतकथा के अनुसार एक लोक कथा के अनुसार आज से करीब कई सौ साल पुराने समय में, झाबुआ जिले के भगोर गांव में एक सघन बस्ती थी। जहां प्राकृतिक आपदा आई, अकाल पड़ा जमीन सूख गई पानी की किल्लत हो गई, कोई ना घास थी, ना कोई पेड़ पौधे। ऐसी स्थिति में लोगों ने देवताओं को पूजना शुरू कर दिया। तब पानी की फुआर होने लगी और फसल की पैदावार हो गई। तब से फसल की पैदावार की खुशी में इस मेले का आयोजन किया जाता है।
युवा ढूंढते है अपना जीवनसाथी
भगोरिया मेला दुनिया का ऐसा मेला है, जहां संगीत की धुन तो होती ही हैं। उस पर थिरकते युवा भी अपने जीवनसाथी की तलाश में निकलते हैं और अपना रिश्ता भी तय करके आते हैं। मेले में आने वाले युवा एक दूसरे को वहीं पसंद कर लेते हैं। इस मेले में युवा गुलाल लगा कर अपने प्यार का इजहार करते हैं। परिजनों की रजामंदी से रिश्ते को पुख्ता करने के लिए एक-दूसरे को पान खिलाया जाता हैं। रंग-बिरंगे परिधानों में सजी युवतियां और उनके आस-पास आदिवासी युवक रहते हैं। जो वहां मौजूद युवतियों को रिझाने के लिए उनके आगे पीछे मंडराते हैं। भगोरिया मेले में ये आम बात है।
'भगोरिया के रंग-संस्कृति के संग’
इंदौर स्टेट प्रेस क्लब, म.प्र.आदिवासियों के लोकपर्व भगोरिया पर दो दिवसीय यात्रा ’भगोरिया के रंग-संस्कृति के संग’ का आयोजन कर रहा है। 17 एवं 18 मार्च 2024 को आयोजित इस यात्रा में 150 से अधिक फोटो-वीडियो जर्नलिस्ट और पत्रकार भाग लेंगे। यात्रा के दौरान भगोरिया पर केन्द्रित छायाचित्र प्रदर्शनी, डाक टिकिट का विमोचन और आदिवासी संस्कृति पर चर्चा भी होगी। अध्यक्ष प्रवीण कुमार खारीवाल ने बताया कि रविवार 17 मार्च को शाम 7 बजे संतोष मैरिज गार्डन, पेटलावद में कार्यक्रम आयोजित होगा। अतिथिगण भगोरिया पर वरिष्ठ छायाचित्रकार श्रीराम चौहान के 30 चित्रों की प्रदर्शनी का शुभारंभ करेंगे। इस अवसर पर आदिवासी संस्कृति के रंग विषय पर चर्चा भी होगी। वही अगला कार्यक्रम सोमवार 18 मार्च को दोपहर 1 बजे पीजी काॅलेज आडिटोरियम, अलीराजपुर में आयोजित होगा। इस अवसर पर भगोरिया पर्व पर केन्द्रित डाक टिकिट का विमोचन एवं वरिष्ठ छायाचित्रकारों का सम्मान किया जायेगा। इससे पहले स्टेट प्रेस क्लब, म.प्र. का दल अमर शहीद चन्द्रशेखर आजाद के भाभरा स्थित प्रतिमा स्थल पर भी जायेगा। इस अवसर पर आजादी के दीवानों की संघर्ष गाथा पर केन्द्रित प्रदर्शनी का आयोजन किया गया है।
झाबुआ-आलिराजपुर जिले में कब कहां किस दिन भगौरिया हाट
- 18 मार्च सोमवार : आलिराजपुर, भाभरा, पेटलावद, बडा गुडा, रंभापुर, मोहनकोट और कुंदनपुर
- 19 मार्च मंगलवार : बखतगढ, आंबुआ, अंधारवाड, पिटोल, खरडू बडी, थांदला, तारखेडी बरवेट
- 20 मार्च बुधवार : बरझर, खटाली, बोरी, उमरकोट, माछलिया, करवड, बोडायता, कल्याणपुरा, मदारानी, ढेकल।
- 21 मार्च गुरूवार : फुलमाल, सोंडवा, जोबट, पारा, हरिनगर, सारंगी, समोई, चैनपुरा
- 22 मार्च शुक्रवार : वालपुर, कठिवाडा, उदयगढ ,भगौर, बेकल्दा, मांडली, कालीदेवी
- 23 मार्च शनिवार : नानपुर, उमराली, राणापुर, मेघनगर, बामनिया, झकनावदा, बलेडी
- 24 मार्च रविवार : छकतला, कुलवट, सोरवा, आमखूंट, झाबुआ, झिरन, ढोलियावाड, आम्बा पिथनपुर, रायपुरिया, काकनवानी और कनवाडा.
- 18 मार्च को बिस्टान
- 19 मार्च को पीपलझोपा एवं मोहना,
- 20 मार्च को धुलकोट एवं सिरवेल,
- 21 मार्च को काबरी एवं सरवर देवला,
- 22 मार्च को टांडाबरूड़,
- 23 मार्च को भगवानपुरा एवं गढ़ी,
- 24 मार्च को भाग्यपुर एवं कमोद
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