- एनजीटी के नियमानुसार नदी के अंदर मशीन की मदद से रेत नहीं निकाल सकते
- खनन को लेकर विपक्ष भी कई बार सरकार को घेर चुका है, पर नतीजा सिफार ही रहा
- नर्मदा नदी के बीच मे मशीनों से चल रहे अवैध उत्खनन को लेकर जनता में मिलीभगत की चर्चा जोरों पर
जानकारों के अनुसार एक पनडुब्बी मशीन तैयार करने में चार से छह लाख रुपये की लागत आती है। पनडुब्बी में बड़े ट्रक का इंजन इस्तेमाल होता है। नदी के तलहटी से रेत खींचने 40 से 50 फीट प्लास्टिक पाइप डाला जाता है। इंजन के दूसरे सिरे पर रेत फेंकने के लिए सैकड़ों फीट लंबी पाइप लाइन लगाकर रेत घाट तक पहुंचाई जाती हैं। पाइप लाइन के नीचे लोहे कि ड्रम को बांधा जाता है ताकि रेत के वजन से पाइप नदी में न डूबे। इंजन में हैवी पंखा लगाया जाता है। जो पानी के तल से रेत खींचता है। रेत खींचने के लिए पनडुब्बी को नाव पर रखकर गहरे पानी में ले जाते हैं। यह मशीन से सुबह से शाम तक 10 से 12 हजार फीट रेत खींच रही है। रेत निकालना कुटीर उद्योग सा हो गया है। गांव के ट्रैक्टर खेती के काम में कम रेत ढोने के काम में ज्यादा आते हैं। एक ट्रैक्टर रेत में ढाई से तीन हजार रुपये की होती है तो वही रेत ट्रैक्टरों की मदद से जब दूर खड़े डंपरों में भर जाती है तो बीस से पच्चीस हजार रुपये की हो जाती है। बीच नदी से निकाली ये अवैध रेत ठेकेदार के नाकों पर रॉयल्टी की रसीद कटाकर वैध हो जाती है. नदियों के घाट से रेत उत्खनन को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के निर्देशों को ताक पर रख खुलेआम नदी में मशीने चलने से जलीय जंतुओं को नुकसान हो रहा है। एनजीटी के नियमानुसार किसी भी हालत में नदी के अंदर से रेत नहीं निकाली जानी चाहिए।
मालवा-निमाड़ (डेस्क) - प्राकृतिक संपदा से भरपूर मालवा-निमाड़ क्षेत्र में नर्मदा, शिप्रा, चंबल, ताप्ती नदियों के क्षेत्र से रेत माफिया बेखौफ रेत खनन में जुटे हैं। विधानसभा से लेकर लोकसभा चुनाव तक लगातार मुद्दा बनने वाली यह समस्या का समाधान न जनप्रतिनिधि करवा पा रहे हैं, न जिम्मेदार कोई प्रयास कर रहे हैं। राजनीतिक रसूख की वजह से खनन माफिया पर अव्वल तो कार्रवाई ही नहीं होती और यदि कहीं हुई भी तो नाममात्र की। इस पर रोक लगाने वाले अफसरों से लेकर क्षेत्र के विधायक-सांसद से लेकर अन्य जनप्रतिनिधी भी सवालों के घेरे में हैं।रेत के लिए नदी के किनारों को धीरे-धीरे खत्म किया जा रहा है। एनजीटी की गाइडलाइन के विपरीत नदी से रेत को पनडुब्बी, जेसीबी, पोकलेन जैसी भारी भरकम मशीनों से निकाला जा रहा है। इससे नदी की संरचना ही बिगड़ती जा रही है। जीवनदायिनी और पुण्यदायिनी पवित्र नदी नर्मदा को लेकर जहाँ एक ओर प्रदुषण नियंत्रण बोर्ड ने चार निकायों पर कार्यवाही में परिवाद दायर कर क्षतिपूर्ति की दंडात्मक कार्यवाही की है तो वहीँ दूसरी ओर मशीनों से छलनी हो रहे नर्मदांचल में इन मशीनों को वजह से जल की शुद्धता भी प्रभवित हो रही है। लेकिन इन मशीनो पर लगाम लगाने में प्रशासन ही शंका के घेरे में आ गया है। सूत्र बताते है की जब भी खनिज, राजस्व अथवा पुलिस विभाग कार्यवाही करने की तैयारी करता है उससे पहले ही खननकर्ताओ को सुचना मिल जाती है और मशीनों समेत सभी गायब हो जाते है। इससे स्पष्ट होता है की खननकर्ताओ के सशक्त नेटवर्क में प्रशासन से लेकर राजनितिक रसूखदार भी शामिल है चूँकि बगैर अंदरूनी मदद के ऐसी सूचनाएं प्राप्त नहीं की जा सकती।
और तो और खनन का यह व्यापार कई खुनी संघर्षों का कारण भी रहा है कई प्रशासनिक अधिकारी खनन रोकते समय खननकर्ताओ हथियारों का शिकार हो जाते है। वहीँ दूसरी ओर खनन क्षेत्र को लेकर खनन माफिया आपस में भीड़ जाते है और खामियाजा मजदूरों को भुगतना पड़ता है। अलग-अलग घटनाओ में हजारों मजदुर काल के गाल में समां चुके है। चलता चक्र की टीम ने जानकारी संकलित की तो बीते 6 माह में निमाड़-मालवा में धडल्ले से जारी इस अवैध व्यापार पर कार्यवाही तो हुई पर ना तो खनन रुका ना ही खनन मफियाओ के हौसले कम हुए। कई बार तो ठेकेदारों पर ही अमानक तरीकों से खनन के आरोप लगे। हाल ही में खरगोन और खंडवा जिले के नर्मदा तटीय इलाकों से मशीनों से खनन और आधी रात में चोरी से रेत परिवहन करते डम्परों की शिकायतें कलेक्टर से की गई है। इस पर प्रशासन का सुस्त रवैया खनन माफियाओ के हौंसले बुलंद कर रहा है। रेत निकालना कुटीर उद्योग सा हो गया है. गांव के ट्रैक्टर खेती के काम में कम रेत ढोने के काम में ज्यादा आते हैं. एक ट्रैक्टर रेत में ढाई से तीन हजार रुपये की होती है तो वही रेत ट्रैक्टरों की मदद से जब दूर खड़े डंपरों में भर जाती है तो बीस से पच्चीस हजार रुपये की हो जाती है. बीच नदी से निकाली ये अवैध रेत ठेकेदार के नाकों पर रॉयल्टी की रसीद कटाकर वैध हो जाती है.
नर्मदा नदी में रेत का अवैध उत्खनन कुछ ऐसा है की सरेआम बड़ी-बड़ी मशीनों से रेत निकल जा रही है और इसे अन्य शहरों में बेचा जा रहा है। लेकिन इसके बाद भी प्रशासन कहता है कि उन्हें इस बात की जानकारी नहीं है कि यह अवैध उत्खनन कहां हो रहा है?. ऐसा नहीं है कि प्रशासन के पास पुलिस नहीं है या खनिज विभाग के अधिकारी नहीं हैं, या लोगों के पास गाड़ियां नहीं हैं। पूरी व्यवस्था होने के बाद भी नर्मदा नदी के रेत उत्खनन पर नियंत्रण क्यों नहीं लग रहा यह समझ से परे है। हो सकता है कि सत्ता में बैठे लोग इस रेत से लाभान्वित हो रहे हो इसलिए वह इसे बंद करवाना नहीं चाहते.
- जबलपुर जिले के बरगी विधानसभा से पूर्व विधायक कांग्रेस नेता संजय यादव ने आरोप लगाया है कि चरगवां थाने से मात्र दो-तीन किलोमीटर की दूरी पर नर्मदा में यह हाई-फाई डिवाइस लगाकर बड़े पैमाने पर अवैध तरीके से रेत निकली जा रही है। आसानी से इन्हें कोई भी देख सकता है, इसकी जानकारी प्रशासन को है लेकिन इसके बाद भी अवैध रेत खनन को नहीं रोका जा रहा है।
- सीहोर जिले की भैरूंदा तहसील के नर्मदा तटीय गांव छिदगांव कांछी और बड़गांव से रेत का अवैध खनन करने के लिए नर्मदा नदी के बीचों बीच पनडुब्बियों की मदद से रेत निकालने के कई समाचार है।
- देवास जिले में कन्नौद, खातेगांव, नेमावर जैसी जगहों पर खनन बड़े पैमाने पर होता है। रेत के डंपरों के कारण आए दिन हादसे भी होते हैं। हैरानी इस बात की है कि इन डंपरों पर नंबर प्लेट तक नहीं होती। कन्नौद-खातेगांव क्षेत्र के लोग भी भाजपा नेताओं के समर्थकों पर अवैध खनन के आरोप लगते रहे हैं।
- खरगोन जिले में महेश्वर, मंडलेश्वर, बड़वाह, कसरावद व खरगोन में 20 से ज्यादा जगह अवैध खनन हो रहा है। अकेले बडवाह के नर्मदा तटीय इलाको में 10 से अधिक स्थानों डेहरिया,नावघाट खेड़ी, सेमरला,मुरल्ला,कपास्थल आदि में धडल्ले से मशीनों की मदद से अवैध खनन जारी है। इसके अलावा जिले के तटीय इलाकों में स्थित पुरातात्विक और एतिहासिक धरोहरों पर भी अवैध खनन का दुष्प्रभाव देखा जा सकता है।
- खंडवा जिले में भी तीर्थनगरी ओम्कारेश्वर के निकट ग्राम बिल्लोरा अवैध खनन का गढ़ बनता जा रहा है। बीते दो माह में हुई कार्यवाहियों के बावजूद भी पनडुब्बियों की मदद से बड़ी मात्रा में अवैध रेत खनन का धंधा जोरों पर है। ग्रामवासियों की माने तो खननकर्ताओं को पहले की कार्यवाहियों की सुचना मिल जाती है और अधिकाश खननकर्ता अपनी मशीने हटा लेते है। ऐसे में प्रशासन की कार्यशैली पर प्रश्नचिन्ह उठ रहे है।
- धार जिले में मुख्य रूप से धरमपुरी क्षेत्र में अवैध रूप से रेत खनन का कारोबार जोरों पर है। क्षेत्र में करीब 8 से 10 खदानें हैं, कई बार डंपर और ट्रैक्टर ट्राली से रेत जब्त तक की गई है। पिछले छह माह में करीब 10 से अधिक वाहनों को जब्त किया गया है। इतनी कार्यवाहियों के बावजूद भी खनन माफिया सक्रीय है।
- हरदा जिले में स्थित नर्मदा नदी से रेत माफिया लगातार अवैध खनन कर निकालने में जुटे हैं और बिना रायल्टी ओवर लोड डंपरों के माध्यम से इनका परिवहन किया जा रहा है। मां नर्मदा नदी को छलनी से होने से बचाने के लाख दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत बिल्कुल इसके उलट है।
- बुरहानपुर जिले में ताप्ती नदी के कई घाटों से अवैध रूप से रेत निकली जा रही है। बोहरडा, हतनूर, नागझिरी, राजघाट से दिन-रात रेत का खनन और परिवहन जारी है। इसके अलावा नेपानगर के तीन स्थान और खकनार के दो स्थानों पर भी रेत का अवैध खनन किया जा रहा है। रेत से भरे ट्रैक्टर पुलिस थानों और अन्य सरकारी दफ्तरों के सामने से ही गुजरते हैं। अवैध खनन के इस काम में अधिकृत ठेकेदार के साथ अन्य रेत माफिया शामिल हैं। बीते दिनों शाहपुर थाना क्षेत्र के दो स्थानों में रेत माफिया ने खनिज निरीक्षक गोविंद पाल के साथ झूमाझटकी भी की थी और अवैध रेत भरे ट्रैक्टर छुड़ा कर ले गए थे।
- मंदसौर जिले में रेतम, शिवना और चंबल नदी सहित लगभग 30 जगहों से रेत का अवैध खनन हो रहा है। राजनीतिक दलों से जुड़े प्रभावशाली लोग पुलिस व प्रशासन की मदद से प्रतिदिन खनन कर रहे हैं। खनिज विभाग भी इनके सामने असहाय जैसा ही है। अवैध खनन पर रोक नहीं लगी।
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