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इक्छु रस से आहार करा कर मनाई गयी अक्षय तृतीया



सनावद (निप्र) - जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ का जन्म चैत्र कृष्ण नौवीं के दिन सूर्योदय के समय हुआ। उन्हें ऋषभनाथ भी कहा जाता है। उन्हें जन्म से ही सम्पूर्ण शास्त्रों का ज्ञान था। वे समस्त कलाओं के ज्ञाता और सरस्वती के स्वामी थे। सन्मति जैन काका ने बताया की अक्षय तृतीया के पावन अवशर पर प्रातः दिगम्बर जैन बड़ा मंदिर, आदिनाथ छोटा मंदिर,णमोकार धाम मंदिर एवम पोदनपुरम में सभी धर्मावलंबियों के द्वारा पंचामृत व जलाभिषेक किया गया ततपश्चात सामूहिक पूजन किया गया।इसी अवसर  पर सुपार्श्वनाथ मंदिर जी मे सामूहिक रूप से भगवान आदिनाथ मंडल विधान संगीता बाकलीवाल,मंजुला भूच, रेखा जैन, रानी भुच चेतना गोधा,सोनाली पाटोदी, कमलेश भूच, राकेश जैन नरेश पाटनी सहित सभी समाजनों के द्वारा कराया गया।तथा पोदनपुरम में तीर्थंकर आदिनाथ को पड़गाहन कर सर्वप्रथम इक्छु रस से आहार वारिश जैन, वैभव सराफ , राजा जैन, अभिजीत जैन, संजय जैन, स्वाति जैन,मीना जैन, अंशुमा जैन, रेणु जैन के द्वारा आहार दान देकर पुण्य अर्जित किया।रात्री में भक्ति व पंडित अचिन्त्य जैन के द्वारा प्रवचन किये गये।

जैसे की सभी को ज्ञात है की वैशाख शुक्ला तृतीया को अक्षय तृतीया पर्व मनाया जाता है। इस दिन जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव (आदिनाथ ) ने राजा श्रेयांस के यहां प्रथम इक्षु रस का आहार लिया था, जिस दिन तीर्थंकर ऋषभदेव का आहार हुआ था, उस दिन वैशाख शुक्ला तृतीया थी। अतः आज भी लोग इसे अक्षय तृतीया कहते हैं। जैनधर्म के अनुसार भरत क्षेत्र में इसी दिन से आहार दान की परम्परा शुरू हुई। ऐसी मान्यता है कि मुनि का आहार देने वाला इसी पर्याय से या तीसरी पर्याय से मोक्ष प्राप्त करता है। राजा श्रेयांस ने भगवान आदिनाथ को आहारदान देकर अक्षय पुण्य प्राप्त किया था, अतः यह तिथि अक्षय तृतीया के रूप में मानी जाती है सभी को ज्ञात है की भगवान ऋषभनाथ ने ही विवाह-संस्था की शुरुआत की और प्रजा को पहले-पहले असि , मसि , कृषि , विद्या, शिल्प और वाणिज्य-व्यापार के लिए प्रेरित किया।  इसके पूर्व तक प्रजा की सभी जरूरतों को क्लपवृक्ष पूरा करते थे। उनका सूत्र वाक्य था- 'कृषि करो या ऋषि बनो।'

ऋषभनाथ ने हजारों वर्षों तक सुखपूर्वक राज्य किया फिर राज्य को अपने पु‍त्रों में विभाजित करके दिगम्बर तपस्वी बन गए। उनके साथ सैकड़ों लोगों ने भी उनका अनुसरण किया। जब कभी वे भिक्षा मांगने जाते, लोग उन्हें सोना, चांदी, हीरे, रत्न, आभूषण आदि देते थे, लेकिन भोजन कोई नहीं देता था। इस प्रकार, उनके बहुत से अनुयायी भूख बर्दाश्त न कर सके और उन्होंने अपने अलग समूह बनाने प्रारंभ कर दिए। यह जैन धर्म में अनेक सम्प्रदायों की शुरुआत थी। अत: आदिनाथ को एक वर्ष तक भूखे रहना पड़ा। इसके बाद वे अपने पौत्र श्रेयांश के राज्य हस्तिनापुर पहुंचे। श्रेयांस ने उन्हें गन्ने का रस भेंट किया जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। वह दिन आज भी 'अक्षय तृतीया' के नाम से प्रसिद्ध है। इस अवसर पर विशाल सराफ़ संजय चौधरी, सुनिल जैन, मनीष पंचोलिया, अक्षय जैन,प्रियंका पंचोलिया गरिमा सराफ , स्वेता पंचोलियां निकिता सराफ, गवाक्षी जैन, अनिता जैन सहित सभी समाजजन उपस्थित थे।

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