एमपी में कर्मचारियों की आवाज उठाने वाले बड़े कर्मचारी संगठनों के रजिस्ट्रेशन निरस्त कर दिए गए है। कई दशकों से कर्मचारियों और अधिकारियों की आवाज को सरकार के पास पहुंचाने वाले कई कर्मचारी संगठनों को मौन कर दिया गया है। मान्यता खत्म होने से ये संगठन न तो सरकार से पत्राचार कर सकते हैं, न अपनी बात मंत्री-अफसरों से मिलकर बता सकते… तो आखिर ये फैसला लिया क्यों? और इसके अंदरखाने और कौन सी बातें चल रही हैं।
भोपाल (ब्यूरो) - मध्यप्रदेश में पहली बार 7 लाख कर्मचारियों और 5 लाख पेंशनर्स की लड़ाई लड़ने वाले संगठनों के पंजीयन निरस्त कर दिए गए हैं। अब इतने बड़े वर्ग की लड़ाई लड़ने वाला कोई नहीं है। मान्यता खत्म होने से ये संगठन न तो सरकार से पत्राचार कर सकते हैं, न अपनी बात मंत्री-अफसरों से मिलकर बता सकते हैं। पंजीयन निरस्त करने वाली संस्था उद्योग विभाग के अधीन है और यह विभाग सीएम डॉ. मोहन यादव के पास है। मामला सीएम तक पहुंचा तो उन्होंने रजिस्ट्रार फर्म्स सोसायटी को तलब किया गया है, जिन कर्मचारी संगठनों के पंजीयन रद्द हुए है वो 50 से 55 साल पुराने बताए जा रहे हैं। इधर कर्मचारी संगठनों के पदाधिकारियों और नेता का कहना है कि कर्मचारी संगठनों के आपसी मतभेद का फायदा असिसटेंट पंजीयक उठा रहे हैं। एमपी के पूर्व सीएम कमलनाथ ने एक्स पर लिखा है कि इस फैसले के बाद बीजेपी सरकार का कर्मचारी विरोधी चेहरा उजागर हो गया है। तो पूर्व नेता प्रतिपक्ष डॉ गोविंद सिंह ने भी इस फैसले की निंदा की है। इधर बीजेपी का कहना है कि वो इस विषय पर गंभीर है और जायज फैसला लेगी। एमपी में आजादी के बाद ऐसा पहली बार हुआ है जब कर्मचारियों की आवाज उठाने वाले संगठनों के पंजीयन निरस्त कर दिए गए हों। हालांकि, इसमें कर्मचारियों की आपसी मतभेद भी एक बड़ी वजह निकल सामने आ रही है। लेकिन, अब इस मामले पर सबकी नजरें सूबे के मुखिया मोहन यादव की तरफ हैं और इन संगठनों के पंजीयन बहाली में कितना वक्त लगेगा। इस पर सबकी नजर है।
भाजपा का तानाशाह चेहरा
कमलनाथ ने एक्स पर लिखा है कि मध्य प्रदेश में 12 लाख कर्मचारी और पेन्शनर्स की आवाज उठाने वाले संगठनों का रजिस्ट्रेशन ख़त्म कर भाजपा सरकार ने अपना कर्मचारी विरोधी और तानाशाह चेहरा एक बार फिर उजागर कर दिया है। इनमें से कुछ संगठन 50 साल तो कुछ 30 साल से अधिक समय से पंजीकृत थे। संगठन का पंजीकरण रद्द करने का अर्थ है कि अब कर्मचारी और पेंशनर्स की ओर से ये संगठन सरकार से बात नहीं कर पाएँगे। यह सीधे-सीधे कर्मचारियों की आवाज़ को दबाना है। यह आलोकतांत्रिक और मानवाधिकारों का हनन है। नाथ ने आगे लिखा है कि स्पष्ट है कि सरकार कर्मचारियों का दमन करना चाहती है और यह भी चाहती है कि इस उत्पीड़न का कोई प्रतिरोध ना हो सके। यह एक गहरा षड्यंत्र है। मैं मुख्यमंत्री से माँग करता हूँ कि तत्काल इन संगठनों की मान्यता बहाल करें।
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