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MPSIDC का 575 करोड़ का बकाया : सोम डिक्सलरी पर आखिर क्यों मेहरबान है मोहन सरकार

 


भोपाल (ब्यूरो) - एक तरफ मध्य प्रदेश की सरकार लगातार आर्थिक संकट से जूझ रही है, लगभग हर सप्ताह सरकार करोड़ों का कर्ज ले रही है लेकिन दूसरी तरफ प्रदेश के बड़े बकाया दारू पर वसूली की कार्रवाई नहीं की जा रही। खासतौर पर मध्य प्रदेश के सबसे बड़े शराब माफिया सोम डिक्सलरी पर सरकार बेहद मेहरबान है। पंजाब केसरी को मिली जानकारी के मुताबिक मध्य प्रदेश स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड (MPSIDC)  के करीब 575 करोड रुपए सोम डिक्सलरी और इसके संचालक जगदीश अरोड़ा, अजय अरोड़ा पर बकाया है लेकिन चाहे डॉक्टर मोहन यादव की सरकार हो या फिर इससे पहले शिवराज सिंह चौहान की सरकार किसी ने भी सोम डिक्सलरी से करोड़ों की इस बकाया राशि की वसूली करने की ज़हमत नहीं उठाई। इतना ही नहीं इसके अलावा जो महत्वपूर्ण जानकारी पंजाब केसरी को मिली है उसके मुताबिक GST का भी लगभग 8 करोड़ के आस पास की रकम सोम डिक्सलरी पर बकाया है।

पिछले दिनों 10 मई को सोम डिस्टलरीज के संचालकों जगदीश अरोरा, अजय अरोरा और अनिल अरोरा पर उनके कर्मचारी और पार्टनर राधेश्याम सेन ने कई गंभीर आरोप लगाकर अपनी कार में आत्महत्या कर ली थी। आत्महत्या के पहले राधेश्याम सेन ने एक वीडियो बनाकर अपनी पत्नी को भेजा था, जिसमें सेन ने बताया कि सोम डिस्टलरीज के संचालक जगदीश अरोरा, अनिल अरोरा और अजय अरोरा ने साल 2003 में एक सेल कम्पनी में उन्हें पार्टनर बनाया था। इस सेल कम्पनी के जरिये जगदीश अरोरा ने करोड़ो के जीएसटी की चोरी की। साथ ही पार्टनरशिप के पैसे भी राधेश्याम सेन को नहीं दिए गए। जब करोड़ो के जीएसटी की वसूली की बारी आई तो जगदीश अरोरा ने राधेश्याम सेन को महज 15 लाख रुपये देकर चुप करा दिया। एक तरफ जहां इस सेल कम्पनी के जरिये जीएसटी की चोरी जारी रही वहीं दूसरी तरफ राधेश्याम सेन पर करोड़ो का बकाया जीएसटी भरने का दबाव बढ़ता गया। जिसके चलते 10 मई को राधेश्याम सेन ने वीडियो में सोम डिस्टलरीज की सारी पोल खोलने के बाद आत्महत्या कर ली। लेकिन मृतक के आखिरी बयान वीडियो के तौर पर सामने आने के बाद भी अपने रसूख के चलते जगदीश अरोरा, अजय अरोरा और अनिल अरोरा पुलिस के शिकंजे से दूर हैं।

कर्मचारियों को कागज पर सोम डिस्टलरीज का संचालक बनाकर कानून से बचते रहे 

मप्र छत्तीसगढ़ समेत अन्य राज्यों में शराब सिंडिकेट चला रहे सोम डिस्टलरीज के संचालक जगदीश अरोरा, अजय अरोरा और अनिल अरोरा पहले भी कई मामलों में बड़ी चालाकी से कानून के शिकंजे से बचते रहे हैं। फिर चाहे वो कोरोना के वक्त सेनिटाइजर निर्माण में करोड़ो की जीएसटी चोरी का मामला हो, मप्र-छग में अवैध शराब की तस्करी का मामला हो या एक्सपायरी शराब का मामला हो। हर बार कागजों पर अपने कर्मचारियों को संचालक बनाकर कानून के शिकंजे से ये बड़े सरगना बच निकलते हैं। पंजाब केसरी को मिले महत्वपूर्ण दस्तावेजों में खुलासा हुआ है कि अरोरा बन्धु अपने हर गोरखधंधे वाली सेल कम्पनी में अपने वेतनभोगी कर्मचारियों को पार्टनरशिप का लालच देकर शामिल कर लेते हैं। और इन सेल कम्पनियों के जरिये तमाम गैरकानूनी व्यापार संचालित किये जाते हैं। जब कानून का शिकंजा ई सेल कम्पनियों पर कसने लगता है तो कुछ हजार की तनख्वाह पाने वाले कर्मचारियों को कम्पनी का डायरेक्टर बना कर कानून के आगे फेंक दिया जाता है। 

राधेश्याम सेन को आत्महत्या के लिए अरोरा ने उकसाया, रसूख के आगे बेबस कानून और सरकार

पिछले दिनों जगदीश अरोरा के तथाकथित पार्टनर और 15 हज़ार का कर्मचारी राधेश्याम सेन ने अपनी कार में आत्महत्या कर ली। आत्महत्या के पहले राधेश्यान सेन ने वीडियो बनाकर सोम डिस्टलरीज का सारा कच्चा चिट्ठा खोलकर रख दिया। इतना ही नही राधेश्याम सेन ने सुसाइड नोट में भी साफ तौर पर आत्महत्या के लिए मजबूर करने वाले सभी दोषियों (जगदीश अरोरा, अजय अरोरा और अनिल अरोरा) के नाम लिख दिए थे। लेकिन करीब 15 दिन गुजरने के बावजूद अभी तक ना तो इन आरोपियों से टी टी नगर पुलिस ने पूछतांछ की और ना ही इन पर मामला ही दर्ज किया गया। दूसरी तरफ सोम डिस्टलरीज के लोग लगातार राधेश्याम सेन के परिवार को डरा धमका रहे हैं। लेकिन अरोरा बन्धुओं के राजनैतिक और प्रशासनिक रसूख के चलते पुलिस इनका नाम लेने से भी कतरा रही है। ऐसे में पुलिस की कार्यप्रणाली और कानून व्यवस्था दोनों पर ही गम्भीर सवाल खड़े हो रहे हैं। सवाल सुशासन की बात करने वाली मप्र की मोहन सरकार की नीयत पर भी हैं क्योंकि सरकार और गृह मंत्रालय दोनों के मुखिया डॉ मोहन यादव हैं। लेकिन शराब माफिया पर कड़ी कार्रवाई होगी या नही ये कोई नही जानता।

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